एक मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाला कुम्हार ईश्वर से कहता है

एक मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाला (कुम्हार) ईश्वर से कहता है….._* हे प्रभु तू भी एक कलाकार है और मैं

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उलझेंगे नहीं,* *तो सुलझेंगे कैसे

*ये जीवन है…साहब..* *उलझेंगे नहीं,* *तो सुलझेंगे कैसे…* *और बिखरेंगे नहीं,* *तो निखरेंगे कैसे….* *”ख़्वाब भले टूटते रहे मगर “हौंसले”*

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फ़िक्र” करने वालो* *को “आपको” ही पहचानना होगा |

*रोटी पर “घी” और* *नाम के साथ “जी”* *लगाने से,* *”स्वाद” और “इज्जत”* *दोनों बढ़ जाते हैं |* *किसी को

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ज़िन्दगी मौके कम और अफसोस ज्यादा देती हे

“समय की कीमत अखबार से पूछो* *जो सुबह चाय के साथ होता है वही रात् को रद्दी हो जाता है”*

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