Inspirational SMSPoems

यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है

यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है

थक कर बैठ गये क्या भाई मंज़िल दूर नहीं है

चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से

चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिन्ह जगमग से

शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही;

और नहीं तो पांव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से

बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है

थक कर बैठ गये क्या भाई मंज़िल दूर नहीं है

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,

सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का।

एक खेप है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;

वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।

आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;

थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,

लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।

जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,

अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।

और अधिक ले जा्च, देवता इतना क्रूर नहीं है

थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

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